मशकूर अहमद उस्मानी

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इस तथ्य से कोई इंकार नहीं कर सकता कि युवा एक प्रणाली को बदल सकते हैं, एक मौजूदा सरकार पर सवाल उठा सकते हैं और वह राष्ट्र की ऐसी आवाज बन सकते है जिसकी उसे आवश्यकता है। जब भी राष्ट्र को जरुरत पड़ी है युवा आगे आये है और शिक्षा का इस में काफी रोल रहा है। डॉ मशकूर अहमद उस्मानी उनमें से एक हैं जो हमेशा शिक्षा और राष्ट्र निर्माण में अपनी शक्ति पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

मशकूर अहमद उस्मानी बिहार के दरभंगा के रहने वाले हैं। उस्मानी को संविधान संशोधन अधिनियम 2019 और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के खिलाफ विरोध करने के लिए जाना जाता है। वे 2017 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने गए थे। उन्होंने अजय सिंह को 6,719 वोटों से हराया था। 2018 में, उन्होंने भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी से उनके आवास पर मुलाकात की और उन्हें एएमयू में आमंत्रित किया था। 2019 में उन्होंने सीएए-एनआरसी, भारतीय नागरिकता अधिनियम, 2019 में संशोधन के खिलाफ अभियान शुरू किया था। उस्मानी को 2020 में हो रहे बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जाले सीट से अपना उम्मीदवार बनाया है।

बिहार राज्य के दरभंगा के गरौले में जन्मे और पले-बढ़े, इस 26 वर्षीय को हमेशा से ही शिक्षा का प्रसार करने की इच्छा रही है और जहाँ भी वे गए इस काम को अनजाम दिया। उनके पिता एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं जिन्होंने जेपी मूवमेंट (1974) के दौरान अपनी सक्रियता शुरू की और माँ दरभंगा के एक मदरसा की हेडमिस्ट्रेस (प्रिंसिपल) हैं। माता-पिता दोनों ने उनके लिए शिक्षा को प्राथमिकता दी और उन्हें एक अच्छा मुकाम हासिल करने के लिए प्रोत्साहित किया। उसके अंदर जो विद्रोही प्रकृति है, उनके माता-पिता की दैन है। सिर्फ माता-पिता ही नहीं बल्कि उनके पैतृक पिता भी एक महान इस्लामी विद्वान थे जिन्होंने इस क्षेत्र में शैक्षिक विकास में योगदान दिया है।

गुणवत्ता ओर ग्रेड के साथ अपनी स्कूल की पूरी करने के बाद उस्मानी ने एक डॉक्टर बनने और अपने काम से बिहार का चेहरा बदलने की आकांक्षा की। वह पाठ्येतर गतिविधियों शामिल होते और उन विषयों पर बहस करते थे जिनके बारे में उन्हें लगता था कि उन्हें मुखर और आलोचनात्मक होने की आवश्यकता है और उनकी प्रतिभा ने उन्हें अपने स्कूल के दिनों में बिहार राज्य स्तरीय वाद-विवाद प्रतियोगिता का चेहरा बनने का मौका दिया।

वर्ष 2010 में उनके जीवन में एक बदलाव आया जब उन्हें पहली बार भारत के सर्वोच्च शैक्षणिक संस्थान, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रवेश मिला और सच तो यह है कि बिहार का चेहरा बनने की उनकी यात्रा यहीं से शुरू हुई। एक छात्र के रूप में अपने डेंटिस्ट्री के दिनों के दौरान उन्होंने देखा कि मीडिया में मुसलमानों की रूढ़िवादी छवि पेश की जाती है और केवल युवाओं की पहचान को खराब करना था। इन संकटों से जूझते हुए उन्होंने 2017 में छात्र संघ चुनाव लड़ा। उनके शक्तिशाली और विचारशील भाषणों ने उन्हें अधिकतम समर्थन और वोट दिलवाया; उन्होंने एक वर्ष के लिए AMUSU के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया और अब राज्य की राजनीति में उतर गए हैं।

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